मेहरानगढ़ फोर्ट 561 वर्ष से 120 मीटर ऊंची पहाड़ी पर सीना ताने आज भी गर्व के साथ खड़ा है। इस फोर्ट की प्राचीर पर सजी अलग-अलग आकार की तोपें आज भी लोगों को बरबस अपनी तरफ आकर्षित करती है और लोग कौतुहल से उन्हें देखते हुए सोचते है कि कभी ये गरजती भी थी या नहीं? युद्धकाल के अलावा भी जोधपुर में रोजाना तोपें गरजती थी। और तीज-त्योहार पर विशेष रूप से तोप दागी जाती थी। नवरात्र स्थापना पर सात और अष्टमी पर 11 तोप दागी जाती थी। दिन में तीन बार समय बताने के लिए रोजाना तोप गरजती ही थी। 47 वर्ष पूर्व यह परम्परा बंद कर दी गई।
प्रतिदिन तीन तोपेंमेहरानगढ़ फोर्ट से प्रतिदिन दोपहर 12, रात नौ और दस बजे तीन तोपें दागी जाती थी। नौ बजे की तोप लोगों के लिए संदेश होता था कि यदि कोई परकोटे से बाहर है तो वह लौट आए अन्यथा दरवाजा बंद कर दिया जाएगा। तीसरी तोप रात दस बजे छोड़ी जाती थी। इस तोप के दागने के साथ ही सुरक्षा प्रहरी शहर के परकोटे पर लगे सभी गेट बंद कर देते थे। इसके बाद शहर में प्रवेश वर्जित था। बिना शहर कोतवाल की आज्ञा के न तो कोई आ सकता था न कोई जा सकता था। यह तोपें दागने की परम्परा मारवाड रियासत के अनुशासन, शौर्य की प्रतीक थी। जो देश आजादी के बाद तक चलती रही। 19 मार्च 1952 के बाद प्रतिदिन की परम्परा को बंद कर दिया गया।
विशेष आयोजनों पर दागी जाती थी तोपें
जोधपुर रियासत के भारत गणराज्य में विलय होने के पश्चात तोप केवल राजपरिवार के राज्याभिषेक, पुत्र जन्म, दशहरा, दीपावली,विवाह, जन्मदिन जैसे अवसरों पर तोपें दागी जाती थी, जिसका लेखा-जोखा रजिस्टर में रखा जाता था। यह रजिस्टर आज भी मेहरानगढ संग्रहालय में मौजूद हैं। जिसमे 10 अक्टूबर 1973 तक तोप दागने का लेखा-जोखा दर्ज हैं। रजिस्टर के अनुसार नवरात्रि स्थापना पर 7 तोप, अष्टमी पर 11, दशहरे पर 19, दीपावली को लक्ष्मीपूजन पर 1, महाराजा के जन्मदिन पर 15, महाराजा के किले पहुंचने तथा प्रस्थान करने पर 4, नए चांद(रोजा) के दिखने पर 1 तोप छोडी जाती थी।
फोर्ट पर हैं कई ऐतिहासिक तोपें
मेहरानगढ़ फोर्ट पर कई एतिहासिक तोपें रखी हुई है। जिनमें किलकिला, शंभुबाण, जमजमा, कड़क बिजली, वगस वाहन, बिच्छु बाण, गजनी खान, नुसरत, गुब्बार व धुड़धानी नाम की तोपें प्रसिद्ध है। प्रत्येक तोप अपने आप में इतिहास को समाए हुए है। जोधपुर नरेश गजसिंह(1619-38) ने जालोर किले पर चढ़ाई और गजनी खान नाम की तोप को जीत कर जोधपुर ले आए। महाराजा अजीतसिंह(1708-24) ने 560 किलोग्राम वजनी कड़ बिजली तोप घाणेराव से बनवा कर मंगाई। किलकिला तोप भी महाराजा अजीत सिंह ने उस दौर में अहमदाबाद से 1400 रुपए में बनवाई थी। कहा जाता है कि किलकिली और जमजमा के धमाके सुन गर्भवती महिलाओं के गर्भ तक गिर जाते थे। मेहरानगढ़ फोर्ट पर चीन में निर्मित एक तोप भी रखी हुई है। वर्ष 1901 में यहां के महाराजा सरदार सिंह के संरक्षक सर प्रताप चीन गए थे। वहां से लौटते समय अपने साथ एक तोप भी लेकर आए। इसे फोर्ट की प्राचीर पर रखा हुआ है। जो आज भी मारवाड़ के शौर्यपूर्ण इतिहास को ताजा करती हैं।

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